चलो... कि याद मुस्कान बने
बचपन की यादें सबसे मुखर होती हैं, उस दौर की तरह। तब का शोर भी अब कानों को संगीत की तरह याद आता है। ज़ोर देकर किसी भी दौर को याद न करना पड़े, इसीलिए मुस्कानों को यादों के जखीरे में सबसे अहम जगह दें।
जीवन की यात्रा में मुस्कराहटों के पड़ावों की गिनती अक्सर करते रहनी चाहिए। बीती हुई राहों की यह यात्रा सेहत के लिए अच्छी है, चेहरे की मांसपेशियों से लेकर दिमाग़ की तरोताज़गी के लिए, मानसिक शक्ति को बढ़ाने और सामाजिकता को नई ऊर्जा देने के लिए भी।
सफ़र तो यादगार बन जाते हैं, कुछ अच्छा, या नागवार-सा भी याद रह जाता है, लेकिन जिन्हें सोचकर, मन ही मन दोहराकर भला महसूस होता है, उनका हिसाब तो तुरंत रख ही लेना चाहिए। इसकी वजह है। अच्छी यादें बनाते समय हमें पता ही नहीं चलता कि यह दिन, यह लम्हा, हमें बाद में बहुत याद आएगा।
स्कूल के दिनों में जत्थे में चलना कितना सामान्य लगता था। स्कूल जाते-आते हुए, गेट से बाहर निकलते, एक-दूसरे को धकियाते, खिलखिलाते, चिल्लाते हुए चलना। ख़ुद अपनी ऐसी यादों की किसी के पास तस्वीर नहीं होगी। खुशनुमा यादों का एक तगड़ा आधार होते हैं स्कूल के दिन याद करने बैठिए तो घंटों इन्हीं दिनों अटककर रह जाता है। लेकिन जब उस दौर में थे, तब ऐसा नहीं महसूस होता था।
हालांकि, उस दौर में हर दिन नया होता था, हर दिन की गतिविधि नई लेकिन हर बात लगती थी क़ाबिले- ऐतराज़ न क्लास अच्छी लगती थी, न रोज़-रोज़ का स्कूल जाना, न स्कूल की वर्दी, न प्रोजेक्ट और परीक्षाएं तो सबसे ज़्यादा ज़हर लगती थीं। आज सोचिए। सब मिलकर एक ही तरह के इम्तेहान दे रहे हों, हाथ में तख़्ती और पेन लिए, सवालों का इंतज़ार कर रहे हों, ऐसा फिर नहीं होता। इम्तेहान तो जीवनभर होते रहते हैं, सवाल भी सामने आते ही हैं, लेकिन विषय वही होते हुए भी सबके पास अलग तरह का प्रश्नपत्र होता है, जिसमें प्रश्न अक्सर पाठ्यक्रम से बाहर के ही आते हैं, और शिकायत की कोई गुंजाइश नहीं। जैसे ही पढ़ाई वाले इम्तेहानों की कुर्सी से उठकर, जीवन की कक्षा में आते हैं, उसी दिन से वो बचपन के एक से इम्तेहान का रोमांच अच्छी यादों के पाले में खिसक आता है। प्रश्न सरल बन जाते हैं और तब का तनाव और बेचैनी, आज के सुकून का सबब बन जाती है।
खुशियों की यादों से बनी यह संदूकची सदा भरी रहती है। इसी में होते हैं परिवार के साथ बिताए पल, बुजुर्गों की छांव, बेफिक्री की छलांगें और लापरवाही भरे उत्साही फ़ैसले ये तो बाद में किए आकलन के नतीजे हैं। जब हाथ में होते हैं, तो कांच जैसा ही चमकता है हीरा ।
इनको जड़ लें कहीं कि कद्र बनी रहे। एक जुमला है- 'हज़ारों उलझनों के बावजूद यह याद रखो कि यह समय फिर लौटकर नहीं आएगा।' यह कमाल का फिल्टर है, जिसे उसी दम इस्तेमाल करते ही मुस्कराहटें छनकर निकल आती हैं।
दिन-रात की दौड़भाग में मुस्कानें बटोरने का वक़्त नहीं पाते। हर दिन ऐसे गुजारते हैं, जैसे कोई मोहल्ला छूट रहा हो। सैकड़ों लम्हे जो आज 'हैं', कल 'थे' कहलाएंगे। इनकी ढेरियां बढ़ती जाएंगी और इनकी चटख पहचान के बावजूद इनमें से मुस्कानों को छांटना आसान नहीं होगा। बच्चों की छुट्टियां आने वाली हैं। यात्रा का मन बनाएं। यात्रा में गुजरता हर क्षण आम दिनों के पलों से
कहीं बड़ा और गुंजाइशी होता है। मानो रोज़मर्रा के पल पर मैग्नीफाइंग ग्लास लगा दिया हो। इसमें बड़ी सारी मुस्कानें और अच्छी यादें अंखुआती हैं।
दर्ज कर लेते हैं कि मुस्कानें फलती-फूलती रहें। गाहे-बगाहे यूं मिलती रहें कि इनकी शक्ल सदा याद रहे।

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