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राजनीतिक सिद्धांत क्या होते हैं।What are political principles.

राजनीतिक सिद्धांत क्या होते हैं।What are political principles.


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POLITICAL SCIENCE NCERT CLASS 11TH


यदि हम अपने आसपास देखें तो हमें आंदोलन, विकास और परिवर्तन दिखेगा। लेकिन अगर हम गहराई से गौर करें, तो हमें यह भी दिखेगा कि निश्चित मूल्य और सिद्धांतों ने जनता को प्रोत्साहित किया और नीतियों को निर्देशित किया है। लोकतंत्र, स्वतंत्रता या समानता एेसे ही आदर्श सिद्धांत हैं। विभिन्न देश एेसे मूल्यों को अपने संविधान में प्रतिस्थापित कर उनकी हिफाजत करने का प्रयास करते हैं जैसा कि, अमेरिकी और भारतीय संविधानों में किया गया है।

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हालाँकि इन संवैधानिक दस्तावेज़ों की उत्पत्ति रातोंरात नहीं हुई। इनका निर्माण उन विचारों और सिद्धांतों के आधार पर हुआ, जिन पर कौटिल्य और अरस्तू से लेकर ज्यांजॉक रूसो, कार्ल मार्क्स, महात्मा गांधी और डॉ. बी. आर. अंबेडकर तक के समय से वाद-विवाद होता आया है। बहुत पहले, ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी में प्लेटो और अरस्तू ने अपने विद्यार्थियों से विचार-विमर्श किया था कि राजतंत्र और लोकतंत्र में से कौन-सा तंत्र बेहतर है। आधुनिक काल में सबसे पहले रूसो ने सिद्ध किया कि स्वतंत्रता मानव मात्र का मौलिक अधिकार है। कार्ल मार्क्स ने तर्क दिया कि समानता भी उतनी ही निर्णायक होती है, जितनी कि स्वतंत्रता। अपने देश में, गांधी जी ने अपनी पुस्तक हिंद-स्वराज में वास्तविक स्वतंत्रता या स्वराज के अर्थ की विवेचना की। अंबेडकर ने ज़ोरदार तरीके से तर्क रखा कि अनुसूचित जातियों को अल्पसंख्यक माना जाना चाहिए और उन्हें विशेष संरक्षण मिलना चाहिए। इन विचारों नेे भारतीय संविधान की प्रस्तावना में स्वतंत्रता और समानता को प्रतिष्ठित किया। भारतीय संविधान के अधिकार वाले अध्याय में किसी भी रूप में छुआछूत का निषेध किया गया और गांधी के सिद्धांतों को नीति-निर्देशक तत्त्व में शामिल किया गया।

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राजनीतिक सिद्धांत उन विचारों और नीतियों को व्यवस्थित रूप को प्रतिबिंबित करता है, जिनसे हमारे सामाजिक जीवन, सरकार और संविधान ने आकार ग्रहण किया है। यह स्वतंत्रता, समानता, न्याय, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता जैसी अवधारणाओं का अर्थ स्पष्ट करता है। यह कानून का राज, अधिकारों का बँटवारा और न्यायिक पुनरावलोकन जैसी नीतियों की सार्थकता की जाँच करता है। यह इस काम को विभिन्न विचारकों द्वारा इन अवधारणाओं के बचाव में विकसित युक्तियोेें की जाँच-पड़ताल के ज़रिये करता है। हालाँकि रूसो, मार्क्स या गांधी जी राजनेता नहीं बन पाए लेकिन उनके विचारों ने हर जगह पीढ़ी-दर-पीढ़ी राजनेताओं को प्रभावित किया। साथ ही एेसे बहुत से समकालीन विचारक हैं, जो अपने समय में लोकतंत्र या स्वतंत्रता के बचाव के लिए उनसे प्रेरणा लेते हैं। विभिन्न तर्कों की जाँच-पड़ताल के अलावा राजनीतिक सिद्धांतकार हमारे ताज़ा राजनीतिक अनुभवों की छानबीन भी करते हैं और भावी रुझानों तथा संभावनाओं को चिन्हित करते हैं।


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लेकिन क्या यह सब, अब हमारे लिए प्रासंगिक है? क्या अब हम स्वतंत्रता और लोकतंत्र प्राप्त नहीं कर चुके हैं? भारत सचमुच स्वायत्त और स्वतंत्र है, हालाँकि स्वतंत्रता और समानता से संबंधित प्रश्नों का उठना बंद नहीं हुआ है। एेसा इसलिए कि स्वतंत्रता, समानता तथा लोकतंत्र से संबंधित मुद्दे सामाजिक जीवन के अनेक मामलों में उठते हैं और विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रफ्.तार से उनकी बढ़ोतरी हो रही है। उदाहरण के लिए, राजनीतिक क्षेत्र में समानता समान अधिकारों के रूप में बनी है, लेकिन यह आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में उसी तरह नहीं है। लोगों के पास समान राजनीतिक अधिकार हो सकते हैं, लेकिन हो सकता है कि समाज में उनके साथ जाति या गरीबी के कारण अभी भी भेदभाव होता हो। संभव है कि कुछ लोगों को समाज में विशेषाधिकार प्राप्त हो, वहीं कुछ दूसरे बुनियादी आवश्यकताओं तक से वंचित हों। कुछ लोग अपना मनचाहा लक्ष्य पाने में सक्षम हैं, जबकि कई लोग भविष्य में अच्छा रोजगार पाने के लिए जरूरी स्कूली पढ़ाई में भी अक्षम हैं। उनके लिए स्वतंत्रता अभी भी दूर का सपना है।

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दूसरे, हालाँकि हमारे संविधान में स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है, फिर भी हमें हरदम नई व्याख्याओं का सामना करना पड़ता है। यह एक तरह से खेल खेलने जैसा है। जैसे हम शतरंज या क्रिकेट खेलते हैं, तो हम सीखते हैं कि उसके नियमों की व्याख्या कैसे करनी है। इस प्रक्रिया में हम खेल के ही नये और व्यापक अर्थ खोज निकालते हैं। ठीक इसी प्रकार नई परिस्थितियों के मद्देनजर संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों की निरंतर पुनर्व्याख्या की जा रही है। इसकी एक बानगी तो यही है कि ‘आजीविका के अधिकार’ को ‘जीवन के अधिकार’ में शामिल करने के लिए अदालतों द्वारा उसकी पुनर्व्याख्या की गई है। सूचना के अधिकार की गारंटी एक नए कानून द्वारा की गई है। समाज बार-बार नई चुनौतियों का सामना करता है। इस क्रम में नई व्याख्याएँ पैदा होती हैं। समय के साथ-साथ संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों में संशोधन भी हुए और इनका विस्तार भी। यद्यपि न्यायिक व्याख्याएँ और सरकारी नीतियाँ नई समस्याओं का सामना करने के लिए बनाई गईं हैं।

तीसरे, जैसे-जैसे हमारी दुनिया बदल रही है, हम आज़ादी और आज़ादी पर संभावित खतरों के नए-नए आयामों की खोज कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, वैश्विक संचार तकनीक दुनिया भर में आदिवासी संस्कृति या जंगल की सुरक्षा के लिए सक्रिय कार्यकर्ताओं का एक-दूसरे से तालमेल करना आसान बना रही है। पर इसने आतंकवादियों और अपराधियों को भी अपना नेटवर्क कायम करने की क्षमता दी है। इसके अलावा, भविष्य में इंटरनेट द्वारा व्यापार में बढ़ोतरी तय है। इसका अर्थ है कि वस्तुओं अथवा सेवाओं की खरीद के लिए हम अपने बारे में जो सूचना अॉन लाइन दें, उसकी सुरक्षा हो। इसीलिए यूँ तो इंटरनेटजन (अंग्रेजी में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों को नेटिजन कहा जाता है) सरकारी नियंत्रण नहीं चाहते, लेकिन वे भी वैयक्तिक सुरक्षा और गोपनीयता बनाये रखने के लिए किसी न किसी प्रकार का नियमन ज़रूरी मानते हैं। परिणामस्वरूप ये प्रश्न उठाए जाते हैं कि इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले लोगों को कितनी स्वतंत्रता दी जानी चाहिए? क्या आप किसी अजनबी को अवांछनीय ई-मेल भेज सकते हैं? क्या आप चैट रूम में अपने उत्पाद का विज्ञापन कर सकते हैं? क्या सरकार आतंकवादियों का सुराग लगाने के लिए किसी के व्यक्तिगत ई-मेल में ताकझाँक कर सकती है? कितना नियमन न्यायोचित है और किसको नियमन करना चाहिए- सरकार को या कुछ स्वतंत्र नियामकों को? राजनीतिक सिद्धांत में इन प्रश्नों के संभावित उत्तरों के सिलसिले में हमारे सीखने के लिए बहुत कुछ है और इसीलिए यह बेहद प्रासंगिक है।


प्राचीन यूनान के एथेंस नगर में सुकरात को सर्वाधिक विवेकशील व्यक्ति कहा जाता था। वह समाज, धर्म और राजनीति के बारे में प्रचलित मान्यताओं को सवालों के कटघरे में खड़ा करने और चुनौती देने के लिए प्रसिद्ध था। इसके लिए ही उसे एथेंस के शासकों द्वारा मृत्युदंड दिया गया।
सुकरात के शिष्य प्लेटो ने उसके जीवन और विचारों के बारे में विस्तार से लिखा है। प्लेटो ने अपनी पुस्तक ‘द रिपब्लिक’ में सुकरात के नाम से एक चरित्र गढ़ा और उसके माध्यम से इस सवाल की जाँच-पड़ताल की कि ‘न्याय क्या है?’
यह पुस्तक सुकरात और सेफलस के बीच एक संवाद से प्रारंभ होती है। इस संवाद के दौरान सेफलस और उसके मित्र समझने लगते हैं कि न्याय की उनकी दृष्टि अपर्याप्त है और उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सुकरात के तरीके में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किसी दृष्टिकोण में निहित सीमाओं और असंगतियों को उजागर करने के लिए वह तर्कबुद्धि का प्रयोग करता है। उसके विपक्षी आखिरकार स्वीकार करते हैं कि उनके वे विचार जिनमें वे जीते थे चलने वाले नहीं हैं।



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