आसमान की इस मखमली चादर पर बिखरे ये अनगिनत सितारे, जो रात के सन्नाटे में चुपचाप टिमटिमाते रहते हैं, महज गैस के सुलगते गोले नहीं हैं। ऐसा लगता है कि उनकी अपनी एक मुकम्मल दुनिया है, एक ऐसा एकांत और अनंत संसार जहां से वे युगों-युगों से इस नीली धरती को निहार रहे हैं। जब हम सिर उठाकर उन्हें देखते हैं, तो लगता है कि वे भी पलटकर हमें ही देख रहे हैं। सदियों, सहस्राब्दियों और अरबों-खरबों सालों से एक ही जगह पर अडिग रहकर चमकने वाले ये सितारे ब्रह्मांड के सबसे पुराने और सबसे खामोश गवाह हैं। वे उस वक्त भी यहीं थे जब धरती पर जीवन का पहला अंकुर फूटा था, वे तब भी थे जब आदिमानव ने पत्थरों को रगड़कर आग जलाई थी, और वे आज भी हैं जब इंसान तकनीक के रथ पर सवार होकर खुद को खुदा समझने की भूल कर रहा है।
अगर ये सितारे बोल सकते, तो शायद वे इंसान के बदलते स्वरूप का ऐसा महाकाव्य लिख देते जिसे सुनकर मानवता शर्मसार हो जाती। उन्होंने इंसान को कबीलों से सभ्यताओं की ओर बढ़ते देखा है। उन्होंने देखा कि कैसे एक वक्त था जब इंसान प्रकृति के आगे नतमस्तक रहता था, पेड़ों, नदियों और पहाड़ों में ईश्वर को देखता था। फिर धीरे-धीरे समय बदला, इंसानी खोपड़ी के भीतर बैठे दिमाग का दायरा बढ़ा और उसके साथ ही बढ़ने लगा उसका अहंकार। सितारों ने देखा कि कैसे पत्थरों से औजार बनाने वाला हाथ कब और कैसे दूसरों की गर्दनों पर तलवारें चलाने लगा। वे गवाह हैं हर उस साम्राज्य के उदय और पतन के, जो सिकंदरों और चंगेज खानों ने खून की नदियों पर बनाए थे। वे आज भी देख रहे हैं कि इतिहास की उन खूनी गलतियों से सबक लेने के बजाय इंसान आज विनाश के ऐसे बारूदी ढेर पर बैठ गया है जो पूरी धरती को कई बार राख कर सकता है।
सोचकर ही रूह कांप जाती है कि ये सितारे ऊपर से इस धरती के इंसानों को देखकर कितना हंसते होंगे। उनकी यह हंसी कोई खुशनुमा मुस्कान नहीं, बल्कि एक गहरा, व्यंग्यात्मक और दर्दनाक अट्टहास होगी। वे हंसते होंगे हमारी उस तथाकथित तरक्की पर, जिसने हमें चांद और मंगल तक तो पहुंचा दिया, लेकिन अपने पड़ोस के घर में रहने वाले इंसान के दिल तक पहुंचने का रास्ता भुला दिया। वे हंसते होंगे हमारी उस 'इंसानियत' पर, जिसका जनाजा हम रोज अपनी आंखों के सामने निकलते देखते हैं और चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं। आज इंसान ने गगनचुंबी इमारतें खड़ी कर ली हैं, समुद्र के सीने को चीर दिया है, हवाओं को मुट्ठी में करने का दावा कर लिया है, लेकिन इस सब के बीच उसने अपनी सबसे कीमती पूंजी खो दी है—वह है संवेदना। आज जब कोई किसी लाचार को सड़क पर तड़पता देखकर मदद के लिए हाथ बढ़ाने के बजाय अपने मोबाइल का कैमरा निकालकर वीडियो बनाने में मशगूल हो जाता है, तो आसमान में टिमटिमाते वे सितारे यकीनन शर्म और अचरज से कांप उठते होंगे।
जिस इंसानियत के दम पर इंसान को इस ब्रह्मांड की सबसे खूबसूरत और समझदार कृति माना गया था, आज वही इंसानियत दम तोड़ चुकी है। इंसान अब सिर्फ अपने स्वार्थ, अपनी भूख, अपनी वासना और अपनी नफ़रत का गुलाम बनकर रह गया है। हमने सरहदें खींच लीं, हमने मजहब के नाम पर दीवारें खड़ी कर लीं, हमने रंग और नस्ल के नाम पर अपनों को ही पराया कर दिया। जो सितारे बिना किसी भेदभाव के पूरी धरती को एक समान रोशनी और मुग्धता देते हैं, वे ऊपर से देखते होंगे कि नीचे रहने वाला यह छोटा सा जीव कितनी संकीर्ण सोच में जी रहा है। वे देखते होंगे कि कैसे एक इंसान दूसरे इंसान का हक मार रहा है, कैसे भूखे बच्चों की चीखों के बीच चंद लोग अमीरी के महलों में सो रहे हैं।
यह सोचना भी कितना अजीब है कि जिन सितारों की उम्र अरबों साल है, उनके सामने इंसान का यह जीवन, उसकी यह सदियों की सभ्यता महज एक पल की झपकी जैसी है। लेकिन इस एक पल की झपकी में ही इंसान ने इस खूबसूरत धरती को लहूलुहान कर दिया है। वह भूल गया है कि वह इस ब्रह्मांड का स्वामी नहीं, बल्कि एक बेहद अदना सा हिस्सा है। सितारे आज भी चमक रहे हैं और शायद तब भी चमकते रहेंगे जब इंसान अपनी ही नफरत और बारूद की आग में जलकर खाक हो जाएगा। वे चुपचाप देखते रहेंगे कि कैसे एक प्रजाति आई, जिसने खुद को सबसे बुद्धिमान कहा, लेकिन अपनी ही बेवकूफी और मरी हुई इंसानियत के कारण खुद ही अपने वजूद को मिटा बैठी। आसमान का वह शांत संसार आज भी हमें देख रहा है, हमारी हरकतों पर हैरान हो रहा है और हमारी मरती हुई रूह पर खामोशी से आंसू बहा रहा है।
✍️ राहगीर

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