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पिता की कठोरता कितनी घातक हो सकती है???

माता-पिता की छाया में पलते हुए किसी भी बच्चे का मानस उस मिट्टी की तरह होता है, जिसे जैसा आकार और नमी मिले, वह वैसा ही रूप ढाल लेता है। जब इस प्रक्रिया में पिता जैसी केंद्रीय और सुरक्षात्मक भूमिका से कठोरता, निरंतर दुत्कार, और बिना सुने खारिज कर देने का व्यवहार मिलता है, तो बच्चे के कोमल मन पर जो गहरे घाव बनते हैं, वे जीवन भर उसकी मानसिक बनावट को प्रभावित करते हैं। पिता की हर बात पर झिड़की और विचारों को सिरे से नकार देने की प्रवृत्ति बच्चे के आत्मविश्वास की नींव को ही हिला देती है। ऐसा बच्चा जब भी अपनी बात कहने की कोशिश करता है और हर बार उसे केवल डांट या उपेक्षा मिलती है, तो वह धीरे-धीरे यह मान बैठता है कि उसकी अपनी कोई आवाज़ नहीं है, उसके विचारों का कोई मूल्य नहीं है। इससे उसमें आत्म-संदेह (Low Self-Esteem) की एक गहरी और पुरानी भावना जड़ जमा लेती है, जो बड़े होने पर भी पीछा नहीं छोड़ती।
जब इस कठोरता में यह पूर्वाग्रह भी जुड़ जाता है कि "इस मां की औलाद कभी सही नहीं हो सकती," तो यह स्थिति साधारण डांट-डपट से कहीं अधिक जहरीली और दमनकारी हो जाती है। यह कथन केवल बच्चे के किसी काम की आलोचना नहीं है, बल्कि उसके अस्तित्व, उसकी पहचान और उसकी जड़ों पर एक सीधा प्रहार है। बच्चा अपनी पहचान माता और पिता दोनों से जोड़कर देखता है। जब पिता द्वारा मां के प्रति कड़वाहट या नफरत का बोझ बच्चे के चरित्र और योग्यता पर थोप दिया जाता है, तो बच्चा एक दोहरे मानसिक आघात से गुजरता है। वह खुद को एक ऐसे युद्धक्षेत्र के बीच में पाता है जहां बिना उसकी किसी गलती के उसे पहले से ही दोषी और अयोग्य करार दिया जा चुका होता है। इस तरह का पक्षपात बच्चे के भीतर अपराधबोध (Guilt) और हीनभावना का एक ऐसा चक्रव्यूह रचता है, जिससे बाहर निकलना उसके लिए लगभग असंभव सा लगने लगता है।
ऐसी पारिवारिक परिस्थितियों में बड़ा होने वाला बच्चा लगातार एक प्रकार के मानसिक दबाव और भय (Chronic Anxiety) के माहौल में जीता है। उसे हर पल यह डर सताता है कि उसका अगला कदम, उसकी अगली बात फिर से किसी झिड़की या अपमान का कारण न बन जाए। इस डर से बचने के लिए कई बार बच्चे अपनी भावनाओं को पूरी तरह से दबा लेते हैं। वे अपनी इच्छाएं, अपनी परेशानियां और अपनी खुशियां भी साझा करना बंद कर देते हैं। इसे मनोविज्ञान में 'इमोशनल शटडाउन' या भावनात्मक रूप से अलग-थलग हो जाना कहा जाता है। बच्चा ऊपर से शांत या आज्ञाकारी दिख सकता है, लेकिन भीतर से वह एक गहरे सूनेपन, अलगाव और अवसाद (Depression) से जूझ रहा होता है।
इस पूर्वाग्रहयुक्त व्यवहार का एक गंभीर परिणाम यह भी होता है कि बच्चे के मन में अपने ही पिता के प्रति एक गहरी फांस, नाराजगी और कई बार नफरत पनपने लगती है। लेकिन साथ ही, समाज और संस्कारों के दबाव के कारण वह इस गुस्से को खुलकर व्यक्त भी नहीं कर पाता। यह दबा हुआ गुस्सा अंदर ही अंदर सुलगता रहता है और कभी-कभी आत्म-घाती व्यवहार, जैसे कि खुद को नुकसान पहुंचाना, पढ़ाई या काम में ध्यान न लगना, या फिर अत्यधिक आक्रामक हो जाने के रूप में बाहर आता है। ऐसे बच्चों में सुरक्षात्मक जुड़ाव (Secure Attachment) का विकास नहीं हो पाता, जिसके कारण वे बड़े होकर दूसरों पर आसानी से भरोसा नहीं कर पाते। उन्हें हर रिश्ते में यही डर बना रहता है कि सामने वाला भी उन्हें देर-सबेर खारिज कर देगा या उनका इस्तेमाल करेगा।
इसके अलावा, पिता का यह रवैया बच्चे की निर्णय लेने की क्षमता को पूरी तरह से अपाहिज कर देता है। जिसे बचपन से हर बात पर यह सुनने को मिला हो कि वह गलत ही होगा, वह वयस्क होने के बाद भी अपने छोटे से छोटे फैसले के लिए दूसरों के अनुमोदन (Approval) पर निर्भर हो जाता है। वह हमेशा दूसरों को खुश करने की कोशिश (People Pleasing) में लगा रहता है ताकि उसे वह स्वीकार्यता मिल सके जो उसे अपने घर में कभी नहीं मिली। या इसके ठीक विपरीत, वह पूरी तरह से विद्रोही बन जाता है और हर अधिकारिक व्यक्ति या संस्था (Authority) के खिलाफ अकारण ही खड़े होने की आदत विकसित कर लेता है।
अंततः, यह समझना बहुत आवश्यक है कि यह व्यवहार पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाले मानसिक आघात (Generational Trauma) की वजह बनता है। जिस बच्चे ने बचपन से केवल पूर्वाग्रह, झिड़कियां और उपेक्षा देखी है, उसे प्रेम और सम्मान की स्वाभाविक भाषा सीखने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। हालांकि, इस मानसिक आघात से उबरना असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए एक लंबे आत्म-मंथन, सही मार्गदर्शन और खुद को यह समझाने की जरूरत होती है कि पिता के पूर्वाग्रह और कड़वाहट उनकी अपनी मानसिक सीमाएं और कुंठाएं थीं, बच्चे की अपनी योग्यता या पहचान का पैमाना नहीं। जब तक व्यक्ति इस सच को स्वीकार करके खुद को उस बीते हुए बचपन के बन्धनों से मुक्त नहीं करता, तब तक मन की शांति और एक स्वस्थ मानसिक जीवन की प्राप्ति कठिन बनी रहती है।

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