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विवाह का असाध्य रूप से टूटना तलाक का आधार :- सर्वोच्च न्यायालय Hindu Marriage Act #हिन्दू विवाह अधिनियम #संविधान का अनुच्छेद 142(1)

विवाह का असाध्य रूप से टूटना  तलाक का आधार :- सर्वोच्च न्यायालय Hindu Marriage Act #हिन्दू विवाह अधिनियम #संविधान का अनुच्छेद 142(1)


चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 द्वारा प्राप्त 'पूर्ण न्याय' करने की अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए फैसला सुनाया कि न्यायालय किसी दंपति के बीच सुलह की बिलकुल भी गुंजाइश न रहने की स्थिति में विवाह को भंग कर सकता है। दूसरी ओर, संबद्ध पक्षकारों को पारिवारिक न्यायालय में आपसी सहमति से तलाक के आदेश के लिये 6-18 महीने तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है, ऐसे में इस प्रक्रिया की तुलना में सर्वोच्च न्यायालय की प्रक्रिया से त्वरित निर्णय की संभावना है।


Hindu Marriage Act #हिन्दू विवाह अधिनियम #संविधान का अनुच्छेद 142(1)




सर्वोच्च न्यायालय का फैसला:

शिल्पा सैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि न्यायालय के पास दंपति के बीच सुलह की बिलकुल भी गुंजाइश न रहने की स्थिति के आधार पर विवाह को भंग करने की शक्ति है।
न्यायालय हिंदू विवाह अधिनियम (HMA), 1955 के तहत तलाक के लिये अनिवार्य छह महीने की प्रतीक्षा अवधि को खत्म कर सकता है और एक पक्ष के इच्छुक न होने पर भी सुलह की गुंजाइश न रहने के आधार पर विवाह को भंग करने की अनुमति दे सकता है।
न्यायालय को पूरी तरह से आश्वस्त और संतुष्ट होना चाहिये कि कोई विवाह "पूर्ण रूप से अव्यावहारिक, भावनात्मक रूप से मृत और रक्षित किये जाने योग्य नहीं है। साथ ही न्यायालय को यदि यह विश्वास हो जाता है कि तलाक ही एकमात्र उपाय है, तो वह इसकी अनुमति दे सकता है। ऐसे में निम्नलिखित कारकों को ध्यान में रखना आवश्यक है:
शादी के बाद की कुल समयावधि जिसमें वे साथ रहे थे।
जब वे आखिरी बार साथ रहे थे।
पक्षकारों द्वारा एक-दूसरे और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की प्रकृति।
कानूनी कार्यवाही में समय-समय पर पारित आदेश।
व्यक्तिगत संबंधों पर संचयी प्रभाव।
न्यायालय द्वारा या मध्यस्थता के माध्यम से विवादों को सुलझाने हेतु क्या और कितने प्रयास किये गए थे और आखिरी प्रयास कब किया गया था।

फैसले का महत्त्व: 

पारिवारिक न्यायालयों के समक्ष प्रतीक्षारत समान मामलों की भारी संख्या के कारण तलाक का आदेश प्राप्त करना प्रायः समय लेने वाला और लंबा होता है।
यह निर्णय पक्षकारों को प्रतीक्षा अवधि और विवाह का असाध्य रूप से टूटने (Irretrievable Breakdown) के आधार पर तलाक हेतु सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने की अनुमति देता है।
सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, यदि सुलह की कोई संभावना नहीं है, तो विवाह के पक्षकारों की पीड़ा या समस्या को बनाए रखना अर्थहीन होगा।
यहाँ तक ​​कि अगर पक्षकारों में से एक सहमत है, तो इस तरह के विवाह को भंग करने से उन भागीदारों को त्वरित समाधान प्राप्त होगा जो एक साथ रहने में असमर्थ हैं, साथ ही इस बात से सहमत हैं कि विवाह को भंग कर देना चाहिये।



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हिंदू विवाह अधिनियम, 1955:

परिचय

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 भारत की संसद द्वारा बनाया गया एक अधिनियम है जो हिंदुओं और अन्य लोगों के बीच विवाह से संबंधित कानून को संहिताबद्ध एवं संशोधित करता है।
यह हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों, सिखों और उन व्यक्तियों पर लागू होता है जो धर्म से मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं।
HMA के तहत तलाक की वर्तमान प्रक्रिया: 

HMA की धारा 13 B में "आपसी सहमति से तलाक" का प्रावधान है, जिसके तहत विवाह के दोनों पक्षों को एक साथ ज़िला न्यायालय में याचिका दायर करनी होगी।
यह इस आधार पर किया जाएगा कि वे एक वर्ष या उससे अधिक की अवधि से अलग-अलग रह रहे हैं तथा एक साथ रहने में सक्षम नहीं हैं और पारस्परिक रूप से सहमत हैं कि उनके वैवाहिक रिश्ते को समाप्त कर देना चाहिये।
दोनों पक्षों को पहली याचिका की प्रस्तुति की तारीख के कम-से-कम 6 महीने बाद और उक्त तिथि के पश्चात् 18 महीने के बाद अदालत के समक्ष दूसरा प्रस्ताव पेश करना चाहिये (बशर्ते, याचिका इस बीच वापस नहीं ली जाती है)।
छह महीने की अनिवार्य प्रतीक्षा का उद्देश्य पक्षकारों को अपनी याचिका वापस लेने का समय देना है।
आपसी सहमति से तलाक की याचिका शादी के एक वर्ष बाद ही दायर की जा सकती है।
HMA की धारा 14 में कहा गया है, " प्रतिवादी की ओर से अत्यधिक दुष्टता या याचिकाकर्ता को हो रही असाधारण कठिनाई" की स्थिति में तलाक की याचिका तुरंत दायर की जा सकती है।
परिवारिक न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत आवेदन में धारा 13 B (2) के तहत छह महीने की प्रतीक्षा अवधि की छूट की मांग की जा सकती है।



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संविधान का अनुच्छेद 142 (1):

अनुच्छेद 142 (1) सर्वोच्च न्यायालय को इस तरह की डिक्री पारित करने या किसी भी कारण या मामले में 'पूर्ण न्याय' करने हेतु आवश्यक आदेश देने के लिये व्यापक शक्ति प्रदान करता है।
अनुच्छेद 142(1) के तहत शक्ति का प्रयोग करने का निर्णय "मौलिक रूप से सामान्य और विशिष्ट सार्वजनिक नीति पर आधारित" होना चाहिये।
सार्वजनिक नीति की मूलभूत सामान्य शर्तें मौलिक अधिकारों, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद और संविधान की अन्य बुनियादी विशेषताओं को संदर्भित करती हैं; विशिष्ट सार्वजनिक नीति को न्यायालय द्वारा परिभाषित किया गया था जिसका अर्थ है "किसी भी मूल कानून में कुछ पूर्व-प्रतिष्ठित निषेध, न कि किसी विशेष वैधानिक योजना के लिये शर्तें और आवश्यकताएँ"।

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